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हैदराबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, नई दिल्ली और डीएसए परियोजना-II द्वारा प्रायोजित एक दो-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘सामाजिक आंदोलन और भारत में दलित साहित्य’ का आयोजन किया गया. इस संगोष्ठी का उद्घाटन 27 फरवरी, 2017 को किया गया.

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इस संगोष्ठी में शिव नाडर विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के प्रो. अनिकेत जावरे ने बीज व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए जोर देकर कहा कि दमित जीवन व्यतीत करने के बावजूद डॉ. आंबेडकर, ज्योतिबा फुले, पेरियार, सावित्रीबाई फुले आदि के नेतृत्व में चलाए गए सामाजिक आंदोलनों के कारण दलित जीवन के सभी क्षेत्रों में आज महान ऊँचाइयों तक पहुँच पाए हैं.

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इस अवसर पर डीएसए परियोजना-II के समन्वयक एवं विभागाध्यक्ष प्रो. प्रमोद नायर ने बताया कि, इस परियोजना के हिस्से के रूप में विभाग अनेक सेमिनारों, कार्यशालाओं और अतिथि व्याख्यानों की श्रृंखला का आयोजन कर रहा है. संगोष्ठी के संयोजक सहायक प्रोफेसर डॉ. बी. कृष्णैया ने संगोष्ठी के विषय का परिचय देते हुए कहा कि सामाजिक आंदोलन और दलित साहित्य दोनों एक दूसरे से जुड़े हैं. ये दोनों पारस्परिक हैं और दलितों के सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक जीवन में जबरदस्त परिवर्तन लाने में सक्षम हैं. डॉ. आंबेडकर, ज्योतिबा फुले और अन्य सामाजिक क्रांतिकारियों की विचारधारा तथा भारी संघर्ष ने दलित लेखकों को साहित्य में उनके मुद्दों और समस्याओं को पेश करने के लिए प्रेरित किया.
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इस कार्यक्रम में बंगाल दलित साहित्य संघ के अध्यक्ष मनोहर बिस्वास; पंजाब के प्रमुख लेखक, पत्रकार और अनुवादक बलबीर माधोपुरी; उत्तराखंड के प्रमुख दलित लेखक रूपनारायण सोनकर और ‘मेरे पिता बालय्या’ के लेखक प्रोफेसर वाई.बी. सत्यनारायण जैसे प्रमुख दलित रचनात्मक लेखकों सहित विभाग के शिक्षकों, शोधार्थियों और छात्रों ने भाग लिया.

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